सांवलियाजी सेठ के दरबार से निकला खजाना, जानिए खजाने की खास बातें

चित्तौडगढ़़। चित्तौडग़ढ़ जिले के प्रख्यात कृष्ण धाम सांवलियाजी में सोमवार की चतुर्दशी के अवसर पर भण्डार खोल नोटो की गिनती शुरू हुई। गिनती करने वाले में मन्दिर अध्यक्ष, सदस्य, उपखंड अधिकारी, विकास अधिकारी, बैंक व मन्दिर कर्मचारी शामिल है। नोटों की गिनती रात तक चलती रही। वही इसी के साथ भगवान साँवरिया सेठ का मासिक अमवस्या मेला भी आरम्भ हो गया है। भगवान सांवलिया सेठ के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में भक्तजन वहां पहुंचे हैं।.  
सांवलिया सेठ के मंदिर में चतुर्दशी के अवसर पर खोले गए भण्डार से तीन करोड़ 30 लाख नकद व दो लाख से ज्यादा कीमत के अमरीकी डॉलर प्राप्त हुए। वहीं भण्डार से 25 ग्राम 700 मिलीग्राम सोने व 1 किलो 830 ग्राम चांदी प्राप्त हुई। भेंट कक्ष में भी चढावा 66 लाख व चांदी का चढावा 28 किलो पार कर गया। एसडीएम मांगीलाल रेगर, अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा, सदस्य मदन व्यास, विजयसिंह, भैरूलाल जाट, भैरूलाल सोनी, प्रशासनिक अधिकारी भगवानलाल चतुर्वेदी, रोकडिय़ा नंदकिशोर टेलर की उपस्थिति में भण्डार खोला गया। दोपहर 2 बजे तक बड़े नोटों की छंटनी व गिनती की गई। बाद में छोटे नोटों की गिनती शुरू की गई। भण्डार से 2 हजार के 1 करोड़ 1 लाख, 500 के 1 करोड़ 27 लाख से ज्यादा के नोट निकले है। शेष नोट सौ, पचास व छोटे थे। इस बार भण्डार से अमरीकी डॉलर 100 के 43 नोट, 20 के तीन, 10 के दो व 1-1 के तीन कुल 438 0 डॉलर प्राप्त हुए। इसके अलावा इंग्लैण्ड के 100 पाउण्ड, 6 रियॉल, 5 दिनार तथा नाईजीरिया के 50 नीरा भी प्राप्त हुए। इस बार 28 किलो 142 ग्राम चांदी व 10 ग्राम स्वर्ण प्राप्त हुआ। इसके अलावा 6 6 लाख 8 4 हजार 8 43 रुपए चढावे के रूप में मिले। प्राकट्य स्थल मंदिर: सांवलियाजी चौराहा स्थित मंदिर में खोले गए भण्डार से 18 लाख, 93 हजार 6 5 रुपए की राशि प्राप्त हुई, जबकि कैशलेस मशीन से 32 हजार 165 रुपए, भेंट कक्ष में 1 लाख रुपए प्राप्त हुए। वहीं अनगढ बावजी में खोले गए भण्डार से 1 लाख 9 हजार 26 9 रुपए की राशि निकली। भंडार की गणना मंगलवार तक पूरी होने की उम्मीद है। इस मंदिर में रिकॉर्ड चढ़ावा एक माह में चार करोड़ रुपए तक आया है।.  
मीरा बाई के गिरधर गोपाल है सॉंवलिया सेठ भगवान श्री साँवलिया सेठ का संबंध मीरा बाई से बताया जाता है। किवदंतियों के अनुसार साँवलिया सेठ मीरा बाई के वही गिरधर गोपाल है जिनकी वह पूजा किया करती थी। मीरा बाई संत महात्माओं की जमात में इन मूर्तियों के साथ भ्रमणशील रहती थी। ऐसी ही एक दयाराम नामक संत की जमात थी जिनके पास ये मुर्तिया थी। बताया जाता है की जब औरंगजेब की मुग़ल सेना मंदिरो को तोड़ रही थी तो मेवाड़ राज्य में पहुचने पर मुग़ल सैनिको को इन मूर्तियों के बारे में पता लगा तो संत दयाराम जी ने प्रभु प्रेरणा से इन मूर्तियों को बागुंड-भादसौड़ा के खुले मैदान में एक वट-वृक्ष के नीचे गड्ढा खोद के पधरा दिया और फिर समय बीतने के साथ संत दयाराम जी का देवलोकगमन हो गया।.     
किवदंतियों के अनुसार कालान्तर में सन 1840 मे मंडफिया ग्राम निवासी भोलाराम गुर्जर नाम के ग्वाले को एक सपना आया की भादसोड़ा-बागूंड गाँव की सीमा के छापर मे 3 मूर्तिया ज़मीन मे दबी हुई है, जब उस जगह पर खुदाई की गयी तो भोलाराम का सपना सही निकला और वहा से एक जैसी 3 मूर्तिया प्रकट हुयी। सभी मूर्तिया बहुत ही मनोहारी थी। देखते ही देखते ये खबर सब तरफ फ़ैल गयी और आस-पास के लोग प्राकट्य स्थल पर पहुचने लगे।.    
फिर सर्वसम्मति से 3 में से सबसे बड़ी मूर्ति को भादसोड़ा ग्राम ले जायी गयी, भादसोड़ा में सुथार जाति के अत्यंत ही प्रसिद्ध गृहस्थ संत पुराजी भगत रहते थे। उनके निर्देशन में उदयपुर मेवाड राज-परिवार के भींडर ठिकाने की ओर से साँवलिया जी का मंदिर बनवाया गया।

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